जो होता है, अच्छे के लिए हो न हो,
तुम्हारे करनी का फल नहीं, फल स्वरूप होता है।
जो होता है क्यों होता है..?
क्या ये किसी की मर्ज़ी है..??
या जो होना था वही हुआ — ये बात ही एकदम फर्ज़ी है।
जो हुआ क्या वही होना था...?
नहीं...
जो हुआ वो क्या अचानक हुआ..??
जी नहीं...
जो होता है वो होते-होते होता है,
तुम्हारे हर क़दम से मंज़िल और मंज़र दोनों तय होते हैं।
"राइट टर्न" लेते तो ये होता..
"लेफ्ट" लेते तो वो होता..
ये इतना आसान मैप नहीं।
हर टर्न और ट्विस्ट पे कहानी निखरती है,
हर "हाँ" और "ना" से क़िस्मत बदलती है।
तुमने जो-जो किया..
उससे वो-वो हुआ...
तुम कुछ और करते तो कुछ और होता..
जो होना था वो नहीं होता।
जो तुम होने देते हो
वो-वो होता चला जाता है।
यूँ ही कोई एवेरेस्ट पे नहीं पहुँचता,
वो हर क़दम एवेरेस्ट की ओर बढ़ता है,
हर साँस में वही अरमान जगाता है,
तब उस एवेरेस्ट की ऊँची वादी में, हाँफती हुई साँसें भर पाता है।

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