Friday, 18 July 2025

दो जिस्म एक जान या एक जिस्म दो वज़ूद

अपने मन की अदालत में,

जब तुमपर मुकदमा चला,

हम हमसे ही लड़ने लगे..

तुम्हारी वकालत तुमसे बेहतर हम करने लगे..


कौन कहता है, "प्यार में दो जिस्म एक जान होते हैं.."


हमारे एक वजूद में तुम भी समाने लगे..

हमें हमारे अंदर "मैं" और "हम", दोनों नज़र आने लगे..


एक चाहे 'अपना वजूद'...

दूजा चाहे 'अपनापन'...

एक कहे, 'मैं क्यूँ झुकूं?'

दूजा कहे, 'अपनी चीज़ उठाने में अकड़ दिखाए क्यूँ?'


"मैं" और "हम" की लड़ाई में, मैंने खुद को हारते देखा है..

मैंने "हम" को जीतते देखा है...

मैंने "हम" को "मैं" पे, हावी होते देखा है...

मैंने "हम" को "मैं" पे, काबू पाते देखे हैं...

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